सुरक्षा कहां थी? नेशनल हाईवे पर मजदूरों की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल
मौत का हाईवे: सुरक्षा मानकों की बलि चढ़ा मजदूर, कौन जिम्मेदार? मरम्मत या मौत का जाल? छावनी में लापरवाही ने ली मजदूर की जान प्रशासनिक लापरवाही का नंगा नाच: हाईवे पर काम कर रहे मजदूरों को DCM ने रौंदा
अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासनिक लापरवाही या मौत का निमंत्रण? हाईवे मरम्मत के नाम पर मजदूरों की बलि
- क्या सड़क निर्माण है या जानलेवा खेल? एक की मौत, तीन जिंदगी से जंग लड़ रहे
- जिम्मेदार कौन? हाईवे पर काम के दौरान बरती गई लापरवाही का खूनी परिणाम
छावनी (बस्ती): नेशनल हाईवे पर सड़क मरम्मत के नाम पर चल रहे काम ने एक बार फिर सुरक्षा मानकों की पोल खोल दी है। मंगलवार देर रात बाबू रहवा गांव के पास हुए हादसे ने साबित कर दिया है कि निर्माण कार्य में सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित है। तेज रफ्तार DCM ने काम में जुटे मजदूरों को कुचल दिया, जिसमें एक की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई, जबकि तीन मजदूर मौत और जिंदगी के बीच जूझ रहे हैं।
सुरक्षा के इंतजाम कहाँ थे?
यह सवाल उन अधिकारियों और शर्मा कंस्ट्रक्शन जैसी कार्यदायी संस्थाओं के लिए है जो हाईवे जैसे संवेदनशील स्थान पर देर रात कार्य तो करवाते हैं, लेकिन मजदूरों की सुरक्षा को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं।
- ट्रैफिक नियंत्रण का अभाव: क्या रात के अंधेरे में भारी वाहनों की आवाजाही के बीच काम शुरू करने से पहले वहां ट्रैफिक डायवर्जन या नियंत्रण की कोई व्यवस्था थी?
- दिखावटी सुरक्षा: यदि वहां पर्याप्त बैरिकेडिंग, चेतावनी देने वाले फ्लैश लाइट और सुरक्षा गार्ड तैनात थे, तो फिर तेज रफ्तार DCM सीधे मजदूरों तक कैसे पहुंच गई?
केवल हादसा नहीं, प्रशासनिक आपराधिक लापरवाही
यह कोई पहली बार नहीं है जब हाईवे पर काम के दौरान मजदूरों की जान गई हो। बार-बार होने वाले ऐसे हादसे यह संकेत देते हैं कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी करना इन कंपनियों की कार्यशैली बन चुकी है। प्रशासन की चुप्पी और NHAI की ढीली मॉनिटरिंग ने इस हादसे की पटकथा पहले ही लिख दी थी।
यदि जांच में यह सामने आता है कि मौके पर पर्याप्त सुरक्षा संकेत या लाइट नहीं लगी थी, तो इसे महज ‘सड़क हादसा’ मानकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। यह सीधे तौर पर उन जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार की लापरवाही है, जिन्होंने चंद पैसों की बचत के लिए मजदूरों की जान को दांव पर लगा दिया।
क्या मिलेगी सजा?
अब देखना यह है कि क्या पुलिस और जिला प्रशासन इस मामले में सिर्फ खानापूर्ति करेगी या उन लापरवाह चेहरों को बेनकाब करेगी जिनकी लापरवाही से एक घर का चिराग बुझ गया और तीन परिवार तबाही की कगार पर हैं। मजदूरों की जान सस्ती नहीं है, और इस बार जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।










